सोते एहसास को गुलज़ार करें तो कैसे

अपनी तदबीर को सरशार करें तो कैसे,
सोते एहसास को गुलज़ार करें तो कैसे।
आँख पहरे में है होंटों पे जड़े हैं ताले,
सहमे जज़बात का इज़हार करें तो कैसे।

जानता हूँ कि उधर मौत का सन्नाटा है,
इश्क़ के बन्दे हैं इंकार करें तो कैसे।
बेवफ़ाओं से वफ़ादारी निभा कर ख़ुश हैं,
क़ल्ब और ज़हन को बेदार करें तो कैसे।

हम ने पत्थर के ख़ुदा अपने हुनर से हैं गढ़े,
अब भला दुनियां को बेज़ार करें तो कैसे।
मुजरिमों में मेरा महबूब नज़र आता है,
इस ख़बर को भला अख़बार करें तो कैसे।

बेंच डाले सभी अल्फ़ाज़ को बाज़ारों में,
गूंगी गोयाई को तलवार करें तो कैसे।
रक़्स में नुक़्स है तो साज़ पे तोहमत कैसी,
घुंघरू पाज़ेब के झंकार करें तो कैसे।

नातवां जिस्म है ‘मेहदी’ का नक़ाहत भी है,
रास्ते उलझे हुए हमवार करें तो कैसे।

RIZVI SIR

मेहदी अब्बास रिज़वी
” मेहदी हल्लौरी “




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