ग़ज़ल : आ जाओ तोड़ कर जंजीरें फिर चलते हैं गुलशन की तरफ़

आ  जाओ  तोड़  कर  जंजीरें  फिर  चलते  हैं गुलशन की तरफ़,

आज़ाद  फ़ज़ाओं  में उड़   लें  क्या  रक्खा  है  बंधन  की  तरफ़।

क़ानून  नहीं   दिल  का   कोई   एहसास   ही  इस  का  ज़ेवर  है,

दुनियाए  हक़ीक़त उसकी है जिस का  दिल रहता जन की तरफ़।

 

तारीकी   बढ़  चढ़  कर हंसती महफ़िल  में  शाम्मा  है बुझी  हुई,

कुछ  किरने  ऐसी  बिखरा  दें  जो   पंहुचे  सोये   मन  की  तरफ़।

हम   तेरी   अदाओं  पर   मरते  यह   जुमला  पहले   दिन  से  है,

पर सब की निगाहें  रहती हैं  मंसब की तरफ़  और धन की तरफ़।

 

आ   जाओ   हमारी  बाहों   में  कुछ  गीत  नया  मिल  कर  गायें,

अब  कोई न  जीने को  जाये बस्ती से निकल  कर बन  की तरफ़।

आना   जाना   तो   फ़ितरत   है   खाना   पीना  भी  फ़ितरत  है,

बेकार  की  उलझन  क्यों  पालें  क्यों  देखें  घुलते  तन की तरफ़।

 

आदत  तो  अपनी दासी  है  जब   चाहें  बदल  कर  हम  रख  दें,

आदत  ही  हमें  पंहुचाती  है  पाज़ेब  की  हर छन  छन की तरफ़।

सोने   के   ज़ेवर   पहना   कर    औरत  को    क़ैदी   कर   डाला,

दीवार  में  ज़िन्दा  चुन  जाती  क्या  देखे  वह   कंगन   की  तरफ़।

 

महबूब  की  गलियों  में  जा  कर ‘ मेहदी ‘ ने  बहुत   ठोकर  खाई,

उस  रस्ते  को  अब  ढूंढ  रहा  जो  जाता  नील  गगन   की  तरफ़।

RIZVI SIR

मेहदी अब्बास रिज़वी

   ” मेहदी हल्लौरी “




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