जोंग और मून के बीच शिखर वार्ता ,अगर इस बार बात न बनी तो स्थिति हो सकती है खतरनाक

04_05_2018-moon_and_kin_leader

पिछले दिनों से उत्तर कोरिया के शासक किम जोंग उन और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे इन के बीच शिखर वार्ता हुई। इस वार्ता को ऐतिहासिक तो माना जा रहा है, लेकिन साथ ही इस वार्ता ने कई प्रश्न को भी जन्म दिया है, जिनका प्रभाव विश्व राजनीति पर भी होगा। उत्तर कोरिया ने इस वार्ता को ऐतिहासिक बताते हुए राष्ट्रीय सुलह, एकता, शांति और समृद्धि के एक युग की शुरुआत की बात कही है, लेकिन वार्ता की शुरुआत परमाणु हथियारों को लेकर हुई है।
हालांकि जिस परमाणु मुक्त कोरियाई प्रायद्वीप के साझा लक्ष्य की अब बात की जा रही है, उस संदर्भ में अभी कोई ठोस रूप रेखा नहीं बनी है, न ही इसके लिए कोई समय सीमा तय की गई है, लेकिन जोंग ने दक्षिण कोरिया को विश्वास दिलाया है कि जून में उनकी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शिखर वार्ता के पहले उत्तर कोरिया एकमात्र भूमिगत परमाणु परीक्षण केंद्र पर ताला लगा देगा। ऐसा होने के पहले जोंग परमाणु विशेषज्ञों और पत्रकारों को निमंत्रण देंगे जो मुख्यत: अमेरिका और दक्षिण कोरिया से आएंगे।

2015 में उत्तर कोरिया ने एक अलग राष्ट्र की छवि बनाने के लिए अपने टाइम जोन को 30 मिनट पीछे खींच लिया था। और तर्क दिया था कि जापान के पूर्व कोरिया कि समय सारणी ऐसी ही थी| ह पानमूनजोम उद्घोषणा पत्र कई प्रश्नों के साथ विश्व राजनीति को झकझोरने का काम कर रहा है। पहला, क्या उत्तर कोरिया अपने परमाणु हथियारों को खत्म करने का मन बना चुका है या महज एक छलावा है? दूसरा, क्या अमेरिका उत्तर कोरिया के अंतरराष्ट्रीय परमाणु प्रक्षेपास्त्र की मारक क्षमता से डर गया है? तीसरा, दोनों कोरिया के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी चीन है।

जोंग ने अपने ही बुनियादी अंदाज में परिभाषित करते हुए कहा कि अब हम 1950 में कि गयी युद्ध कि गलतियों को दोबारा नहीं दोहराएंगे| लेकिन यंहा सवाल यह उठता है कि तानाशाह शासक का ह्रदय परिवर्तन हुआ कैसे अभी कुछ ही दिन पहले इन्होने ने अमेरिका को तबाह करने की बात कहि थी| और अब अचानक वार्ता के लिए तैयार हो गये| उत्तर कोरिया तो वैसे भी अपनी आर्थिक प्रतिबंधों के चलते तबाह ही है समझिये उत्तर कोरिया की आधी आबादी तो कुपोषण का शिकार है और बची हुई आबादी बेरोजगारी के चलते समस्याओ से जूझ रही है | हर दिन जरूरतों की आवश्य्कता गले की फ़ांस बनती जा रही है | बैरहाल क्या वह इस फांस से निकलने के लिए वार्ता की पहल कर रहा है या सही मायने में अपनी सैनिक बुनियाद को बदलकर एक सम्मानजनक राष्ट्र की नींव स्थापित करना चाहता है?