मस्तानी की अधूरी प्रेम कहानी का ‘ गवाह ‘ शनिवार वाड़ा

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शनिवार वाड़ा  ये वही हवेली है जहां बाजीराव की दूसरी पत्नी मस्तानी रहती थी । ये हवेली 1730 में पुणे में मुथा नदी के तट पर पेशवा बाजीराव बल्लाल बालाजी की बहादुरी के सम्मान में बनाई गई थी। दो साल में तैयार हुई इस हवेली को उस समय बनवाने में 16,110 रुपय ख़र्च हुए थे जो एक बहुत बड़ी रक़म मानी जाती थी। बदक़िस्मती से शनिवार वाड़ा वहां रहने वालों के लिए हमेशा अभिशाप रहा। इसकी दीवारों पर ग़द्दारी, दुख और हत्याओं की गाथाएं लिखी हुई हैं। यहां रहने वालों को कभी सुख-चैन नसीब नहीं हुआ। आज भी ये पुणे की सबसे भयावह जगह मानी जाती है। शनिवार वाड़ा के बनने के पहले ही साल पेशवा बाजीराव की असमय अचानक मृत्यु हो गई। इस हवेली ने देखा पेशवा की पहली पत्नी काशीबाई के साथ पेशवा की बेवफ़ाई, मस्तानी के साथ अधूरी प्रेम कहानी और पुत्र नानासाहब (बाजीराव-काशीबाई का पहला पुत्र) के हाथों धोखा।

 

शनिवार वाडा

एक समय था जब शनिवार वाड़ा अपने वास्तु की ख़ूबसूरती के लिए जाना जाता था लेकिन आज पूर्णिमा की रात यहां अजीब अजीब आवाज़ें सुनने को मिलती हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि यहां बाजीराव के पोते नारायणराव का भूत मंडराता है। नारायणराव की उसी के रिश्तेदारों ने हत्या करवाई थी।नानासाहब अपने पिता की मत्यु (पेशवा बाजीराव प्रथम की बीमारी के दौरान) ही मराठा सल्तनत पर बैठ गए थे और शनिवार वाड़ा में रहने लगे थे। उनके तीन पुत्र थे, विश्वासराव, माधवराव और नारायणराव। वैसे उनके दो पुत्र और थे जिनकी जल्द ही मृत्यु हो गई थी। नानासाहब की मृत्यु के बाद सत्ता विश्वासराव के पास आ गई जिसे नानासाहब के भाई रधुनाथराव और उनकी पत्नी आनंदीबाई पचा नहीं पाए। पानीपत की तीसरी लड़ाई में नानासाहब के सबसे बड़े पुत्र विश्वासराव मराठा सेना का नेतृत्व कर रहे थे जबकि उनके दूसरे पुत्र माधवराव युद्ध की रणनीति बना रहे थे। लेकिन उनकी कुछ रणनीतियां उल्टी पड़ गईं जिसकी वजह से विश्वासराव को जान से हाथ धोना पड़ा। बड़े भाई और पेशवा की मृत्यु की ग्लानि में माधवराव बीमार पड़ गए और आख़िरकार उनके भी प्राण निकल गए।

विश्वासराव और माधवराव की मृत्यु के बाद नारायणराव को पेशवा बनाया गया। उस समय उनकी उम्र सिर्फ 16 साल थी और इसीलिए उनके बालिग हेने तक रघुनाथराव को राज-प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया गया।  इससे आनंदीबाई और नाराज़ हो गईं क्योंकि अब तक सत्ता अपने हाथ में लेने की उनकी चाहत काफी बढ़ चुकी थी। नारायणराव अपने रिश्तेदार रघुनाथराव और आनंदीबाई की नीयत से वाक़िफ़ थे। उन्हें ये भी मालूम था कि उनकी बड़े भाई विश्वासराव के साथ उनकी बिल्कुल नहीं बनती थी। उनके करीबी सलाहकारों ने इस नफ़रत की आग में घी का काम किया और जिसके चलते नारायणराव को रघुनाथराव को नज़रबंद करना पड़ा। नज़रबंदी की ख़बर मिलते ही आनंदीबाई आगबबूला हो उठी और नारायणराव से बदला लेने की योजना बनाने लगीं। उन्होंने पति को छुड़ाने और नारायणराव की हत्या करने का षणयंत्र रचा। उन्हें मालूम था कि नारायणराव के लिए मध्य भारत के भील (गार्दी) सिरदर्द बने हुए हैं सो उन्होंने इसका फ़ायदा उठाया। उन्होंने रघुनाथराव को गार्दी के नेता सुमेर सिंह को मदद और नारायणराव को पकड़ने के लिए पत्र लिखने को कहा। पत्र में लिखा था “नारायणराव ला धारा”, जिसका मतलब होता है ‘नारायणराव को पकड़ो।’

लेकिन आनंदीबाई इसे बदलकर कर दिया “नारायणराव ला मारा” यानी नाराय़ण राव को ख़त्म कर दो। गणेश चतुर्थी के आख़िरी दिन रात को गार्दी के प्रशिक्षित हमलावरों ने शनिवार वाड़ा पर हमला बोल दिया और मारकाच के बाद रघुनाथराव को छुड़ा लिया। इसके बाद वे नारायणराव की तलाश करने लगे जो इन सब घटनाओं से अंजान अपने कमरे में सो रहे थे। लेकिन शोर सुनकर उनकी नींद खुल गई और मदद के लिए काका की तरफ भागे लेकिन गार्दी हमलावरों ने उन्हें पकड़ लिया और उन पर वार करने लगे। नारायणराव चीखते रहे, “काका माला वाचवा” लेकिन कोई भी बचाने के लिए नहीं आया।

शनिवार वाड़ा का पतन

 नारायणराव चीखते रहे लेकिन गार्दी हमलावरों ने उनके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। ये सब नज़ारा रघुनाथराव  ख़ामोशी से देख रहे थे। बाद में नारायणराव के शरीर के टुकड़े नदी में फ़ेंक दिए गए। नारायणराव की हत्या के बाद रघुनाथराव और आनंदीबाई ने सत्ता और शनिवार वाड़ा हथिया लिया। बाद में पेशवा प्रशासन ने रघुनाथराव, आनंदीबाई और मुसेर सिंह गार्दी पर मुक़दमा चलाया।आज भी शनिवार वाड़ा में सैलानियों को दिन में सिर्फ बाहर का हिस्सा देखने की इजाज़त है। रात को शनिवार वाड़ा वीरान हो जाता है। इसके बावजूद आज भी कुछ लोग नदी के किनारे रात को कैंप लगाकर शनिवार वाड़ा से नारायणराव की गुहार ‘काका! माला वाचवा’ सुनने की बांट जोते हैं।

शनिवार वाडा

कई इतिहासकारों का मानना है कि राजा छत्रसाल ने अपनी लाड़ली बेटी मस्तानी की शादी बकायदा शाही रीति-रिवाज से बाजीराव के साथ की थी। मस्तानी का असली नाम कंचनी था और वो बुंदेलखंड के महाराजा छत्रसाल की बेटी थीं।  सन् 1727-28 में मुसलमान शासक मोहम्‍मद खान बंगश ने महाराजा छत्रसाल के राज्‍य पर हमला बोल दिया । मदद मांगने के लिए छत्रसाल ने बाजीराव को एक गुप्त संदेश भेजा था । संदेश पाते ही बाजीराव पेशवा अपनी सेना को लेकर मध्य प्रदेश के छतरपुर आ पहुंचे और मोहम्मद खान बंगश को हरा दिया। पेशवा की इस मदद से छत्रसाल इतनी खुश हुए कि उन्होंने अपनी बेटी मस्तानी का हाथ बाजीराव को सौंप दिया । पहली ही मुलाकात में मस्तानी और बाजीराव को एक-दूसरे से प्यार हो गया। उन्होंने मस्तानी से शादी कर उन्हें अपनी दूसरी पत्नी बनाया।

दहेज में दी थी हीरे की खदानें

अपनी इस लाड़ली बेटी की शादी में महाराजा छत्रसाल ने बाजीराव को दहेज में दो हीरों की खदानें, 32 लाख की सोने की मोहरें और सोने-चांदी के कई गहने दिए थे। जानकारों का मानना है कि अगर इस युग के हिसाब से दहेज की कीमत का अंदाजा लगाया जाए तो उसकी कीमत करीब 50 हजार करोड़ होगी। मस्तानी को कई विधाओं में महारत हासिल थी। जिनमें से वो नृत्य में तो बेमिसाल थी ही, साथ ही तलवारबाजी, तीरंदाजी और घुड़सवारी में भी पूरी तरह निपुण थीं। इतिहास बताता है कि मस्तानी को भले ही उस समय के पंडितों ने स्वीकार नहीं किया, लेकिन वो हिन्दू मुस्लिम संस्कृति के नायाब मेल का प्रतीक थीं। वो कृष्ण की भक्त थीं और नमाज भी पढ़ती थीं। पूजा भी करती थीं और रोजा भी रखती थीं।

शनिवार वाडा

बाजीराव पेशवा कौन थे ? 

पेशवा बाजीराव जिन्हें बाजीराव प्रथम भी कहा जाता है। मराठा साम्राज्य के एक महान पेशवा थे। पेशवा का अर्थ होता है – प्रधानमंत्री। वे मराठा छत्रपति राजा शाहू के चौथे प्रधानमंत्री थे। पेशवा बाजीराव ने अपना प्रधानमंत्री का पद सन 1720 से अपनी मृत्यु तक संभाला। उनको बाजीराव बल्लाल और थोरल बाजीराव के नाम से भी जाना जाता है। बाजीराव का सबसे मुख्य योगदान रहा उत्तर में मराठा साम्राज्य को बढाने में और यह माना जाता है अपनी सेना के कार्यकाल में उन्होंने एक भी युद्ध नहीं हारा। इतिहास के अनुसार बाजीराव  घुड़सवार करते हुए लड़ने में सबसे माहिर थे और यह माना जाता है उनसे अच्छा घुड़सवार सैनिक भारत में आज तक देखा नहीं गया। पेशवा बाजीराव का जन्म 18 अगस्त सन 1700 को एक भट्ट परिवार में पिता बालाजी विश्वनाथ और माता राधा बाई के घर में हुआ था। उनके पिताजी छत्रपति शाहू के प्रथम पेशवा थे। बाजीराव का एक छोटा भाई भी था चिमाजी अप्पा। बाजीराव अपने पिताजी के साथ हमेशा सैन्य अभियानों में जाया करते थे। सन 1720 में उनके पिता विश्वनाथ की मृत्यु हो गयी। उसके बाद बाजीराव को 20 साल की आयु में पेशवा के पद पर नियोजित किया गया। बाजीराव ने “हिन्दू पद पादशाही” का प्रचार एक आदर्श बन कर किया।बाजीराव का इरादा था मराठा ध्वज को दिल्ली के दीवारों में लहराते हुए देखना और मुग़ल साम्राज्य को हटा कर एक हिन्दू पद पादशाही का निर्माण करना।

शनिवार वाडा का फव्वारा

पेशवा के पद में बाजीराव का कार्य 

बाजीराव के पेशवा पद पर आते ही छत्रपति शाहू नाम मात्र के ही शासक बन गए और खासकर सतारा स्थित उनके आवास तक ही सीमित रह गए। मराठा साम्राज्य कुंके नाम पर तो चल रहा था पर असली ताकत पेशवा बाजीराव के हाँथ में था। बाजीराव के पद पर आने के बाद मुग़ल सम्राट मुहम्मद शाह ने मराठों को शिवाजी की मृत्य के बाद प्रदेशों के अधीनता को याद दिलाया। सन 1719 में मुग़लों ने यह भी याद दिलाया की डेक्कन के 6 प्रान्तों से कर वसूलने का मराठों का अधिकार क्या है। बाजीराव पेशवा को इस बात का विश्वास था की मुग़ल सम्राट का पतन होते जा रहा है इसलिए वो उत्तर भारत में  अपनी  चालाकी से अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहते हैं। यह सोच कर पेशवा ने हड़ताल शुरू कर दिया।

पेशवा पद पर कुछ कड़ी मुश्किलों का सामना

बाजीराव ने बहुत ही छोटी उम्र में पेशवा पद ग्रहण किया था। जिसकी वजह से उन्हें कई प्रकार के मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। जैसे -छोटी उम्र में पेशवा बनने के कारण कुछ वरिष्ट अधिकारियों जैसे नारों राम मंत्री, अनंत राम सुमंत और श्रीपतराव प्रतिनिधि के मन में ईर्ष्या उत्पन्न हो गयी थी। निज़ाम-उल-मुल्क असफ जह प्रथम,  मुग़ल साम्राज्य का वाइसराय था। उसने डेक्कन में नया राज्य निर्माण किया और मराठों को कर वसूली के अधिकार के लिए चुनौती दिया। बहुत जल्द मराठों ने मालवा और गुजरात में भी प्रदेशों को प्राप्त किया। मराठा साम्राज्य के कुछ राज्यों में पेशवा का नियंत्रण नहीं था जैसे की जंजीर का किला।

निज़ाम-उल-मुल्क असफ जह प्रथम के खिलाफ अभियान

पेशवा बाजीराव 4 जनवरी, 1721 में निज़ाम-उल-मुल्क असफ जह प्रथम से मिले और अपने विवादों को एक समझौते के तौर पर सुलझाया। पर तब भी निज़ाम नहीं माना और मराठों के अधिकार के खिलाफ डेक्कन से कर वसूलने लगा। सन 1722 में निज़ाम को मुग़ल शासन का वजीर बना दिया गया। परन्तु सन 1723 में सम्राट मुहम्मद शाह ने निज़ाम को डेक्कन से अवध भेज दिया। निज़ाम ने वजीर का पद छोड़ दिया और वो दोबारा डेक्कन चला गया। सन 1725 में निज़ाम ने मराठा कर अधिकारियों को खदेड़ने का प्रयास किया और वह इस प्रयास में सफल हुआ। 27 अगस्त सन 1727 में बाजीराव ने निज़ाम के खिलाफ मोर्चा शुरू किया। पेशवा बाजीराव ने निज़ाम के कई राज्यों में कब्ज़ा कर लिया । जैसे – जलना, बुरहानपुर, और खानदेश।

 पल्खेद की लड़ाई

28 फरवरी, 1728 में बाजीराव और निज़ाम की सेना के बिच एक युद्ध हुआ जिसे ‘ पल्खेद की लड़ाई ’ कहां जाता है। इस लड़ाई में निज़ाम की हार हुई उस पर मजबूरन शांति बनाये रखने के लिए दवाब डाला गया। उसके बाद से वह सुधर गया।

मालवा का अभियान

बाजीराव ने सन 1723 में दक्षिण मालवा की ओर एक अभियान शुरू किया। जिसमें मराठा के प्रमुख रानोजी शिंदे, मल्हार राव होलकर, उदाजी राव पवार, तुकोजी राव पवार, और जीवाजी राव पवार ने सफलतापूर्वक चौथ इक्कठा किया।

अमझेरा का युद्ध 

अक्टूबर 1728 में बाजीराव ने एक विशाल सेना अपने छोटे भाई चिमनाजी अप्पा के नेतृत्व में भेजा जिसके कुछ प्रमुख थे शिंदे, होलकर और पवार।  29 नवम्बर 1728 को चिमनाजी की सेना ने मुग़लों को अमझेरा में हरा दिया।

बुंदेलखंड का अभियान

बुंदेलखंड के महाराजा छत्रसाल ने मुग़लों के खिलाफ विद्रोह छेद दिया था। जिसके कारण दिसम्बर 1728 में मुग़लों ने मुहम्मद खान बंगश के नेतृत्व में बुंदेलखंड पर आक्रमण कर दिया और महाराजा के परिवार के लोगों को बंधक बना दिया। छत्रसाल राजा के बार-बार बाजीराव से मदद माँगने पर मार्च , सन 1729 को को पेशवा बाजीराव ने उत्तर दिया और अपनी ताकत से महाराजा छत्रसाल को उनका सम्मान वापस दिलाया। महाराजा छत्रसाल ने बाजीराव को बहुत बड़ा जागीर सौंपा और अपनी बेटी मस्तानी और बाजीराव का विवाह भी करवाया। साथ ही महाराजा छत्रसाल ने अपनी मृत्यु सन 1731 के पहले अपने कुछ मुख्य राज्य भी मराठो को सौंप दिया था।

गुजरात का अभियान

सन 1730 में पेशवा बाजीराव ने अपने छोटे भाई चिमनाजी अप्पा को गुजरात भेजा। मुघर साशन के गवर्नर सर्बुलंद खान ने गुजरात का कर इक्कठा (चौथ और सरदेशमुखी) को मराठों को सौंप दिया।1 अप्रैल 1731 में बाजीराव ने दाभाडे, गैक्वाड और कदम बन्दे की सेनाओं को हरा दिया और दभोई के युद्ध में त्रिम्बक राव की मृत्यु हो गयी। 27 दिसम्बर 1732 में निज़ाम की मुलाकात पेशवा बाजीराव से रोहे-रमेशराम में हुई परन्तु निज़ाम ने कसम खाया की वो मराठों के अभियानों में हस्तक्षेप नहीं करेगा।

सिद्दियों के खिलाफ अभियान

जंजीरा के सिद्दी एक छोटा राज्य पश्चिमी तटीय भाग और जंजीर का किला संभालते थे पर शिवाजी की मृत्यु के बाद से वो धीरे-धीरे मध्य और उत्तर कोंकण पर भी राज करने लगे। सन 1733 में सिद्दी प्रमुख, रसूल याकुत खान की मृत्यु के बाद उसके बेटों के बिच युद्ध सा छिड़ गया। उनके एक पुत्र अब्दुल रहमान ने बाजीराव पेशवा से मदद माँगा जिसके कारण बाजीराव ने कान्होजी अंगरे के पुत्र सेखोजी अंगरे के नेतृत्व में एक सेना मदद के लिए भेजा। मराठों ने कोंकण और जंजीरा के कई जगहों पर काबू पा लिया और 1733 में ही उन्होंने रायगड के किले को भी कब्ज़ा कर लिया। 19 अप्रैल 1736 में चिमनाजी ने अचानक से सिद्दीयों पर आक्रमण कर दिया जिसके कारण लगभग 1500 से ज्यादा सिद्दियों की मृत्यु हो गयी।

दिल्ली की  ओर अभियान

12 मार्च 1736 में बाजीराव पेशवा ने पुणे से दिल्ली की और कुच किया जिसके फल स्वरूप मुग़ल शहनशा ने सआदत खान को उनकी कुच को रोकने को कहा।सआदत खान ने 1.5 लाख के सेना के साथ उन पर आक्रमण कर उन्हें हरा दिया। परन्तु 28 मार्च 1737 को मराठों ने दिल्ली की लड़ाई  में हरा दिया मुग़लों को। भोपाल की लड़ाई  में भी दिसम्बर 1737 को मराठों ने मुगलों को हरा दिया।

पुर्तगाली के खिलाफ अभियान

पुर्तगालियों ने कई पश्चिमी तटों पर कब्ज़ा कर लिया था। साल्सेट द्वीप पर उन्होंने अवैद तरीके से एक फैक्ट्री बना दिया था हिन्दुओं के जाती के खिलाफ वे कार्य कर रहे थे। मार्च 1737 में पेशवा बाजीराव ने अपनी एक सेना चिमनजी के नेतृत्व में भेजा और थाना किला और बेस्सिन पर कब्ज़ा कर लिया वसई की युद्ध के बाद , कहा जाता है बाजीराव पेशवा की मृत्यु 28 अप्रैल 1740 को, 39 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से हुई थी। उस समय वो इंदौर के पास खर्गोन शहर में रुके थे।