
नेपाल में हाल ही में आई बाढ़ और भूस्खलन की घटनाओं ने एक बार फिर हिमालयी इलाके की नाजुक स्थिति को सामने ला दिया है. इसी बीच सामने आई एक नई वैज्ञानिक स्टडी ने खतरे की तस्वीर को और गंभीर बना दिया है. वैज्ञानिकों के मुताबिक हिंदूकुश-हिमालय इलाके में बाढ़, भूस्खलन और भारी बारिश जैसी चरम मौसम की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं. तेजी से पिघलते ग्लेशियर, अस्थिर होती ग्लेशियल झीलें और बारिश के बदलते पैटर्न ने इस खतरे को और बढ़ा दिया है. दून यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ वैज्ञानिक वाईपी सुंद्रियाल, वीर चंद्र सिंह गढ़वाली उत्तराखंड यूनिवर्सिटी ऑफ हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री के डॉ. एसपी सती और इसरो के रिटायर्ड वैज्ञानिक नवीन जुयाल की इस स्टडी में साफ कहा गया है कि पिछले कुछ वर्षों में मानसून के दौरान चरम मौसम की घटनाओं की फ्रीक्वेंसी और इंटेंसिटी, दोनों में इजाफा हुआ है.
यहां तक कि अपेक्षाकृत सूखा रहने वाला उत्तर-पश्चिमी हिमालयी इलाका भी 2010 के बाद से विनाशकारी बाढ़ की घटनाओं का गवाह बना है. हालांकि वैज्ञानिकों की सबसे अहम चेतावनी यह है कि हर हिमालयी आपदा के लिए सिर्फ जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार ठहरा देना असल समस्या से ध्यान भटकाने जैसा है. केदारनाथ (2013), ग्या झील (2014), ऋषिगंगा (2021), दक्षिण ल्होनक झील (2023) और 2025 में ब्यास नदी, धराली-थराली व किश्तवाड़ में हुई आपदाओं का हवाला देते हुए शोधकर्ताओं ने हिमालय की नाजुकता को रेखांकित किया है. आइए जानते हैं वे 5 बड़े कारण, जो जलवायु परिवर्तन के अलावा हिमालय में बढ़ती बाढ़ और भूस्खलन की घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं.
1. तेजी से पिघलते ग्लेशियर
बढ़ता ग्लोबल टेंपरेचर हिमालय के ग्लेशियरों को तेजी से पिघला रहा है. यह पिघलती बर्फ न सिर्फ नदियों में पानी की मात्रा को असंतुलित कर रही है, बल्कि ऊंचाई वाले इलाकों में जमा मलबे और चट्टानों को भी अस्थिर कर रही है. जैसे-जैसे ग्लेशियर सिकुड़ते जा रहे हैं, वैसे-वैसे इनके आसपास की जमीन कमजोर होती जा रही है, जो आगे चलकर अचानक मलबा बहने और भूस्खलन जैसी घटनाओं की वजह बनती है.
2. ग्लेशियल झीलों के फटने का खतरा
ग्लेशियरों के पिघलने से बनने वाली झीलें यानी ग्लेशियल लेक्स की संख्या और आकार, दोनों में बढ़ोतरी हो रही है. ये झीलें अक्सर बर्फ और मलबे के कमजोर बांधों के सहारे टिकी होती हैं, जो किसी भी वक्त टूट सकते हैं. 2023 में सिक्किम की दक्षिण ल्होनक झील के फटने की घटना इसका बड़ा उदाहरण है. जब ऐसी झीलें अचानक फटती हैं, तो भारी मात्रा में पानी, चट्टानें और मलबा नीचे की घाटियों में तबाही मचा देते हैं.
3. अत्यधिक बारिश और बदलता मौसम
वैज्ञानिकों के मुताबिक बढ़ते टेंपरेचर की वजह से ऊंचाई वाले इलाकों में अब बर्फबारी की जगह बारिश हो रही है. इससे पहाड़ों की ढलानों पर जमा मलबा पहले से ज्यादा अस्थिर हो जाता है और भारी बारिश होने पर आसानी से बह निकलता है. स्टडी में यह भी सामने आया कि कई बड़ी और विनाशकारी बाढ़ें मुख्य नदियों से नहीं, बल्कि छोटे ग्लेशियरों और बारिश से बनने वाली छोटी धाराओं से शुरू होती हैं, जो संकरी घाटियों में भारी तबाही मचाने की क्षमता रखती हैं.
4. नदी किनारे और अस्थिर ढलानों पर निर्माण
बढ़ती आबादी और तेज होते अर्बनाइजेशन के चलते लोग लगातार नदी के बाढ़ वाले इलाकों और अस्थिर ढलानों पर निर्माण कर रहे हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि “आपदा तभी आती है जब खतरा और भेद्यता, दोनों एक साथ मौजूद हों.” उत्तराखंड का 2012 का फ्लड प्लेन जोनिंग कानून नदी की सेंटरलाइन से 100 मीटर के दायरे में निर्माण पर रोक लगाता है, लेकिन जमीन पर इसका सख्ती से पालन नहीं हो पा रहा, जिससे बस्तियां और इंफ्रास्ट्रक्चर लगातार खतरे के दायरे में आते जा रहे हैं.
5. सड़कों, पर्यटन और अन्य प्रोजेक्ट्स से बढ़ता मानवीय दबाव
सड़क निर्माण, पर्यटन को बढ़ावा देने वाली परियोजनाओं और दूसरी कमर्शियल एक्टिविटीज के चलते हिमालयी इलाके की पहाड़ियों और ढलानों पर मानवीय दबाव लगातार बढ़ रहा है. इस डेवलपमेंट में अक्सर पहाड़ों की भूगर्भीय संरचना और स्थिरता को नजरअंदाज कर दिया जाता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन एक हकीकत है, लेकिन हर आपदा के बाद सिर्फ इसी को दोष देना काफी नहीं है — जरूरत इस बात की है कि हाई रिस्क वाले इलाकों की पहचान की जाए, निर्माण को प्रभावी ढंग से कंट्रोल किया जाए और मौजूदा कानूनों को सख्ती से लागू किया जाए.
हिमालय में बढ़ती बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं सिर्फ जलवायु परिवर्तन का नतीजा नहीं हैं, बल्कि प्राकृतिक और मानवीय कारणों का मिला-जुला असर हैं. तेजी से पिघलते ग्लेशियर, अस्थिर ग्लेशियल झीलें और बदलता मौसम जहां खतरे को जन्म देते हैं, वहीं बढ़ती आबादी, नदी किनारों और अस्थिर ढलानों पर होता अनियोजित निर्माण, और कानूनों का कमजोर क्रियान्वयन इस खतरे को आपदा में बदल देते हैं. वैज्ञानिकों की चेतावनी साफ है. हर आपदा के बाद सिर्फ जलवायु परिवर्तन को कठघरे में खड़ा कर देना असल समस्या से मुंह मोड़ने जैसा है. जरूरत इस बात की है कि हिमालयी इलाके में हाई रिस्क वाले इलाकों की सही पहचान की जाए, वैज्ञानिक आधार पर निर्माण गतिविधियों को कंट्रोल किया जाए और मौजूदा कानूनों, जैसे उत्तराखंड के फ्लड प्लेन जोनिंग एक्ट, को जमीन पर सख्ती से लागू किया जाए. तभी केदारनाथ, ऋषिगंगा और दक्षिण ल्होनक जैसी त्रासदियों की पुनरावृत्ति को रोका जा सकेगा और हिमालय में रहने वाले लाखों लोगों की जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी.





