
उत्तर प्रदेश में इन दिनों चर्चा सिर्फ बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की है. अशोक सिद्धार्थ के राजनीतिक संन्यास और आकाश आनंद की विदाई के बाद चर्चा पार्टी के अंदर चल रही उस पावर गेम की, जिसकी परतें अब धीरे-धीरे खुल रही हैं. एक तरफ हैं बसपा के इकलौते राज्यसभा सांसद रामजी गौतम हैं, दूसरी तरफ कभी मायावती के बेहद करीबी रहे अशोक सिद्धार्थ और आकाश आनंद. सवाल उठता है कि क्या बसपा के अंदर दो लॉबियों के बीच वर्चस्व की जंग चल रही है?
बसपा में आखिर चल क्या रहा है?
बसपा में ससुर-दामाद यानी अशोक सिद्धार्थ और आकाश आनंद पर हुई कार्रवाई को अगर सिर्फ एक राजनीतिक परिवार के संकट के तौर पर देखा जाए, तो तस्वीर अधूरी रह जाएगी. क्योंकि इसी घटनाक्रम के बीच पार्टी के भीतर एक और चेहरा तेजी से मजबूत हुआ है, जिसका नाम है रामजी गौतम. अशोक सिद्धार्थ पर कार्रवाई होने के बाद रामजी गौतम को पार्टी के 10 राज्यों वाले सेक्टर-1 की जिम्मेदारी मिल गई.
जब अशोक मजबूत हुए, रामजी कमजोर पड़े?
रामजी गौतम लखीमपुर खीरी से आने वाले जमीनी कैडर के नेता हैं. पार्टी में उन्हें आगे बढ़ाने वालों में अशोक सिद्धार्थ का नाम भी लिया जाता रहा है. दोनों कभी मायावती के भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते थे, लेकिन समय के साथ दोनों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की चर्चा शुरू हुई. बसपा के अंदरूनी लोगों के मुताबिक, जब-जब अशोक सिद्धार्थ मजबूत हुए, रामजी गौतम का दायरा सीमित हुआ. उनके प्रभार वाले राज्यों में बदलाव हुए.
रामजी गौतम का कथित ‘मास्टरस्ट्रोक’?
लेकिन जैसे ही अशोक सिद्धार्थ साइडलाइन हुए, रामजी गौतम का कद बढ़ता गया. अशोक पर कार्रवाई हुई और रामजी गौतम को 10 राज्यों वाले सेक्टर-1 की जिम्मेदारी मिल गई. पार्टी सूत्रों के मुताबिक, 3 सितंबर को रामजी गौतम ने पार्टी के कुछ शीर्ष पदाधिकारियों के बीच कथित तौर पर कहा था कि आकाश आनंद को अगर बसपा में काम करना है तो अशोक सिद्धार्थ को राजनीति छोड़नी होगी. हालांकि, इसकी पुष्टि किसी ने नहीं की है.
‘पार्टी पर कब्जे’ का डर कितना सच?
अशोक सिद्धार्थ ने अपने राजनीतिक संन्यास वाले पत्र में इशारों में कहा कि उनके राजनीतिक विरोधी मायावती के कान भर रहे थे. दावा था कि अशोक सिद्धार्थ, आकाश आनंद के जरिए पार्टी पर प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं. लेकिन सवाल है किक्या ऐसा करना वास्तव में इतना आसान था? बसपा की केंद्रीय संगठनात्मक संरचना में मायावती के भरोसेमंद नेताओं का मजबूत नेटवर्क है. आनंद कुमार, सतीश चंद्र मिश्र, यूपी अध्यक्ष विश्वनाथ पाल और दूसरे वरिष्ठ पदाधिकारी.
एक बड़े नेता की भूमिका
इस पूरे घटनाक्रम में एक नाम और बेहद अहम है. पार्टी सूत्रों के मुताबिक, 3 सितंबर को आकाश आनंद के खिलाफ कार्रवाई के बाद दिल्ली के एक यूट्यूबर की सोशल मीडिया पोस्ट को अशोक सिद्धार्थ ने री-पोस्ट किया. इस पोस्ट में पार्टी नेतृत्व और कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए थे. सूत्रों का दावा है कि इसी पोस्ट का स्क्रीनशॉट और पूरा ब्योरा मायावती तक एक बड़े नेता के जरिए पहुंचा. मायावती ने इसे अनुशासनहीनता के तौर पर देखा.
आकाश की नाराजगी की असली वजह?
आकाश आनंद की नाराजगी सिर्फ हालिया कार्रवाई की वजह से नहीं बताई जा रही. पिछले कुछ सालों में उन्हें कई बार जिम्मेदारी मिली. फिर हटाया गया. फिर वापस लाया गया. 2024 से 2026 के बीच उनका राजनीतिक ग्राफ लगातार ऊपर-नीचे होता रहा. जेवर की सभा को लेकर भी विवाद हुआ. आरोप लगा कि कार्यक्रम मायावती की अनुमति के बिना तय किया गया था. इसके बाद आकाश के भविष्य में होने वाले कार्यक्रमों के लिए मायावती की अनुमति जरूरी कर दी गई.
25 अगस्त, 31 अगस्त और 3 सितंबर- तीन तारीखें
फिर आईं तीन अहम तारीखें 25 अगस्त, 31 अगस्त और 3 सितंबर… इन तीनों बैठकों में आकाश आनंद को नहीं बुलाया गया. 3 सितंबर के बाद पार्टी में उनकी स्थिति और स्पष्ट हुई. आकाश ने अपने सोशल मीडिया बायो में बदलाव किया. यानी जो बात पार्टी की ओर से साफ-साफ नहीं कही गई थी, उसकी पुष्टि आकाश की सोशल मीडिया प्रोफाइल से होती दिखाई दी, लेकिन इस बार आकाश ने भी अपना रुख बदल लिया.
‘आपके दामाद’- सबसे बड़ा भावनात्मक मोड़
और फिर आया 9 सितंबर. मायावती की पोस्ट में आकाश आनंद को संबोधित करते हुए अशोक सिद्धार्थ के लिए लिखा गया- आपके दामाद. आकाश के करीबी सूत्रों के मुताबिक, यह बात उन्हें बेहद आहत करने वाली लगी. अशोक सिद्धार्थ ने अपने राजनीतिक संन्यास वाले पत्र में भी इसी भावनात्मक पहलू को उठाया. उन्होंने संकेत दिया कि आकाश उनके दामाद बाद में बने, लेकिन उससे पहले वह मायावती के भतीजे हैं.
आकाश ने क्यों ठुकराया वापसी का रास्ता?
इस बार आकाश आनंद ने कथित तौर पर दोबारा कोई पद लेने से इनकार कर दिया. यहां तक कि मायावती की पोस्ट को री-पोस्ट करने के आग्रह को भी स्वीकार नहीं किया. 3 सितंबर के बाद से उन्होंने मायावती की पोस्ट री-पोस्ट नहीं की. करीबी सूत्रों के मुताबिक, परिवार के कुछ सदस्य आकाश को मनाने और दोनों पक्षों के बीच रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन आकाश का मौजूदा रुख बताता है कि इस बार मामला पहले जैसा आसान नहीं है.
ईशान आनंद की एंट्री
इसी बीच मायावती ने आकाश आनंद के छोटे भाई ईशान आनंद को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी. सवाल है कि क्या ईशान को आगे बढ़ाकर बसपा एक नया युवा चेहरा तैयार कर रही है? या फिर यह आकाश पर बढ़ते दबाव का हिस्सा है? क्योंकि 2027 का चुनाव बेहद करीब है और बसपा के सामने एक बड़ी चुनौती है कि युवा दलित वोटर को किस चेहरे के जरिए जोड़ा जाए? आकाश अगर पूरी तरह किनारे रहते हैं तो यह स्पेस खाली हो सकता है और यही स्पेस चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी और सपा-कांग्रेस जैसे विपक्षी खेमे भरने की कोशिश कर सकते हैं.
कांशीराम बनाम मायावती—उत्तराधिकारी मॉडल
अब कहानी का सबसे बड़ा सवाल. कांशीराम ने मायावती को वर्षों तक तैयार किया. उन्हें राजनीतिक जिम्मेदारियां दीं… संगठन में मजबूत किया और आखिरकार उत्तराधिकारी घोषित किया. मायावती ने 2023 में आकाश आनंद को उत्तराधिकारी घोषित किया, लेकिन इसके बाद आकाश को कई बार जिम्मेदारी से हटाया गया और वापस लाया गया. अब एक बार फिर वह पार्टी से बाहर हैं और उनके छोटे भाई ईशान को आगे बढ़ाया जा रहा है.
आकाश आनंद या ईशान आनंद?
यहीं से कांशीराम और मायावती के नेतृत्व मॉडल का फर्क सामने आता है. मायावती के दौर में पार्टी के भीतर मजबूत होकर उभरने वाले कई नेता अलग हो गए. स्वामी प्रसाद मौर्य, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बाबूराम कुशवाहा, दारा सिंह चौहान और कई दूसरे बड़े नाम. बसपा के भीतर इस वक्त जो कुछ चल रहा है, उसका असर सिर्फ पार्टी संगठन तक सीमित नहीं रहेगा. आकाश आनंद अगर वापस आते हैं तो उनकी भूमिका क्या होगी? अगर नहीं आते तो ईशान आनंद क्या उनकी जगह ले पाएंगे? इस पूरे घटनाक्रम में रामजी गौतम का बढ़ता कद क्या बसपा के भीतर नए पावर सेंटर की शुरुआत है?





