
अभी 25 सितंबर को वरिष्ठ पत्रकार पद्मभूषण राम बहादुर राय के 80 वर्ष पूरे होने पर एक पुस्तक का विमोचन हुआ, अस्सी के राय साहब! विमोचन कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विशिष्ट अतिथि वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव थे. वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता में स्थानीय संपादक रहे बनवारी ने इस कार्यक्रम की अध्यक्षता की.
इस अवसर पर राम बहादुर राय ने अपनी स्पीच में कहा, ‘आज देश भारत मोदी मार्ग पर है, गांधी मार्ग से स्वाधीनता संग्राम की यात्रा प्रारंभ हुई थी. मोदी मार्ग और गांधी मार्ग जहां मिलते हैं और जो मिलता है, उनका 110 वां जन्म दिवस पंडित दीन दयाल उपाध्याय का आज है. उनकी स्पीच को समझा ही नहीं गया और सोशल मीडिया पर राय साहब के खिलाफ लोग अनर्गल लिखने लगे. कुछ ने तो भाषा की मर्यादा भी लांघ ली
मोदी मार्ग का दर्शन
निश्चय ही गांधी मार्ग का देश की आजादी में महत्त्वपूर्ण योगदान है. किंतु पिछले लगभग 80 वर्षों में चीज़ें बहुत कुछ बदली हैं. बहुत सारी चीज़ें अब चलन से बाहर हो चुकी है. जब सब कुछ परिवर्तनशील है तो गांधी मार्ग सदैव एक जैसा कैसे रह सकता है? हर सत्तासीन व्यक्ति की तरह मोदी में भी कई सारी विकृतियां होंगी पर कोई राजनेता यदि पिछले 25 वर्षों से अनवरत सत्ता पर बैठा है तो उसमें ख़ासियतें भी होंगी.
इन खासियतों की अनदेखी करना एक तरह से सावन के अंधे वाली कहावत को चरितार्थ करना है. मोदी किसी भी प्रदेश, देश को चलाना जानते हैं. उनके असंख्य विरोधी होंगे लेकिन यदि वे फिर भी कुर्सी पर हैं तो कोई तो उनका भी मार्ग होगा. राम बहादुर राय का इशारा इसी मोदी मार्ग की तरफ़ था. उनका कहना एकदम दुरुस्त है कि देश आज मोदी मार्ग पर चल रहा है.
लेफ्ट और राइट की साझा सरकारें
अब आते हैं पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद के सिद्धांत पर. पंडित दीनदयाल उपाध्याय भारतीय जनसंघ (BJS) के सह संस्थापक थे. जब 1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ (भारतीय जनता पार्टी की पूर्ववर्ती राजनीतिक पार्टी) की स्थापना की तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से पंडित दीनदयाल उपाध्याय को पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई का महासचिव बनाया. जल्द ही वे भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त हुए. 1967 में यह पार्टी लोकसभा में 35 सीटें ले कर देश की तीसरी सबसे बड़ी पोलिटिकल पार्टी बनी.
यह पहला चुनाव था जब घोर दक्षिणपंथी जनसंघ और वामपंथी सीपीआई/ सीपीएम एक मंच पर आए. कई राज्यों में संविद सरकारें बनीं. उस समय सबका साझा दुश्मन कांग्रेस थी इसलिए दोनों विपरीत ध्रुवीय पार्टियों ने साझा शत्रु को परास्त करने के लिए परस्पर हाथ मिलाए.
मनुष्य के समग्र विकास की अवधारणा
इस मेल-मिलाप में पंडित दीन दयाल उपाध्याय का अहम रोल था इसलिए उसी वर्ष जनसंघ के कालीकट अधिवेशन में पंडित दीन दयाल उपाध्याय को पार्टी का अध्यक्ष चुना गया. पंडित जी ने अपने अनुभव और अध्ययन के बूते एकात्म मानववाद का सिद्धांत प्रतिपादित किया. एकात्म मानववाद मनुष्य के लिए समग्र विकास, पुरुषार्थ, पूंजीवाद और मार्क्सवाद का विरोध, अंत्योदय एवं प्रकृति और समाज में सामंजस्य का दर्शन देता है.
उनके इस दर्शन में पश्चिमी देशों से अलग अपने देश की परंपराओं का अनुपालन करने का विचार छुपा है. इसमें देश के हर व्यक्ति के समग्र विकास की अवधारणा है. वह किसी भी जाति, धर्म, समुदाय का हो. मनुष्य का विकास और उन्नति ही एकात्म मानववाद है. पंडित दीन दयाल उपाध्याय का दर्शन भारत की हर दुविधा को खत्म करता है. इसमें व्यर्थ का दिखावा नहीं है और यही इस दर्शन की उपलब्धि है.
भारत का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
उनका मानना था कि सेक्युलरिज्म, पूंजीवाद और मार्क्सवाद पश्चिम के दर्शन हैं. जब हमने आज़ादी के बाद गांधी मार्ग पर चलने का निश्चय किया था तो इन पश्चिमी दर्शनों को ओढ़े रखने का क्या लाभ! यहीं से दूसरे राजनीतिक दलों से यह विचारधारा मेल नहीं खाती थी क्योंकि देश के दूसरे राजनीतिक दलों का मानना था कि हमें राष्ट्र बनाया अंग्रेजों ने इसलिए हम पश्चिम को नकार नहीं सकते. सभी राजनीतिक दल मानते थे कि राष्ट्र की अवधारणा हमारी नहीं है. इसलिए हमें कुछ संशोधनों के साथ पश्चिमी दर्शनों को भी आत्मसात करना पड़ेगा.
इसके विपरीत पंडित दीन दयाल उपाध्याय भारत को सनातन राष्ट्र मानते थे. उनके अनुसार यह कल्पना पश्चिम से कहीं पुरानी है. क्योंकि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद हमें एक सूत्र में बाँधता है. हमें इसी परंपरा से देश के भविष्य का निर्माण करना चाहिए.
बीजेपी ने भी एकात्म मानववाद अपनाया
ये दोनों अवधारणाएं परस्पर टकराती हैं. लेकिन पश्चिमी चिंतन में मनुष्य नहीं मशीन सर्वोपरि है. इसलिए वहां मानवीय चेतना और संवेदनाएँ नहीं दीखतीं. पंडित दीनदयाल उपाध्याय के इन विचारों को जनसंघ के विजयवाड़ा अधिवेशन में स्वीकार किया गया. इसे एकात्म मानववाद का दर्शन नाम भी तभी मिला. इमरजेंसी के बाद 1977 में जो चुनाव हुए उसमें जनसंघ ने भी जनता पार्टी में अपना विलय कर लिया था.
1980 में जब जनता पार्टी से अलग होने के बाद जनसंघ के लोगों ने पुनः अपनी पार्टी बनाई तो पार्टी का नामकरण हुआ भारतीय जनता पार्टी. इसने भी 1985 में एकात्म मानववाद को मूल दर्शन के रूप में स्वीकार किया. जहां व्यक्ति और समाज एकाकार होते हैं यही एकात्म मानववाद है. देखा जाए तो यह गांधी मार्ग का ही देशी रूप है और भारतीय मानकों के रूप में गांधी मार्ग का विस्तार है. इस दर्शन को अछूत करार देना क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ है.
यथा पिंडे तथा ब्रह्माण्डे का विचार
भारत में भौतिकवाद की प्रतिष्ठा कभी नहीं रही. यहां मानवीय चेतना सदैव भौतिकवाद के ऊपर रही. फिर चाहे वह वैदिक दर्शन हो या अवैदिक. ब्राह्मण, बौद्ध, जैन परंपरा भी अध्यात्म को ऊपर रखती रही है. विशुद्ध भौतिकवादी चार्वाक भी कहीं न कहीं अध्यात्म के आगे नत हुए. पंडित जी कहते हैं भौतिक बनाम अध्यात्म नहीं वरन् दोनों के मध्य एकात्मकता ही भारतीय दर्शन है. यतो अभ्युदय निश्रेयस संसिद्धि स धर्म: सृष्टि व परमेष्ठी की एकात्मता का विचार है. भारतीय परंपरा कहती है, यथा पिंडे तथा ब्रह्माण्डे यानी जो पिंड है (एक छोटी इकाई जैसे एक गांव) वही ब्रह्मांड है.
यह बहुत ऊंची कल्पना है. न कोई बड़ा न छोटा. देखा जाए तो यह दर्शन तमाम विविधताओं के बीच एकता के सूत्र तलाशता है. सच तो यह है कि दीनदयाल उपाध्याय की यह कल्पना गांधीवाद का ही विस्तार है.
राम बहादुर राय ने एकता के सूत्रों को जोड़ा
इसलिए 25 सितंबर को डॉ. नई दिल्ली के अम्बेडकर इंटरनेशनल सेंटर में पद्म भूषण राम बहादुर राय ने जो कहा वह उनके विचारों का विचलन नहीं बल्कि कहीं न कहीं एकता के सूत्र जोड़ने की कोशिश है. आज मोदी मार्ग जो कुछ भी हो, सफल है. यकीनन देश ने इस दौर में नई ऊंचाइयों को स्पर्श किया है. आर्थिक तरक्की की राह पर भारत है. इसे मोदी विरोधियों द्वारा खारिज कर देना कोई बुद्धिमत्ता का काम नहीं है. राय साहब ने इसीलिए तो गांधी मार्ग और मोदी मार्ग के सेतु को एकात्म मानववाद बताया है.
राय साहब के इन विचारों पर मंथन होना चाहिए. जो लोग राय साहब की इस युक्ति को नकार रहे हैं, वे दरअसल सत्य से आंखें चुरा रहे हैं. राम बहादुर राय वही हैं, जिन्होंने इमरजेंसी का विरोध किया था और पहली गिरफ्तारी भी उन्हीं की हुई थी. इसीलिए तो लाखों लोग नारा लगाते थे, ‘जेल के ताले टूटेंगे, राम बहादुर छूटेंगे!
राय साहब विवाद से कभी नहीं डरे
मैंने और राय साहब ने 1983 में जनसत्ता एक ही दिन जॉइन किया था. उन्होंने कभी भी किसी भी तरह की विचारधारा के व्यक्ति को अपने से दूर नहीं किया. मैं स्वयं मार्क्स के दर्शन से प्रभावित था लेकिन राय साहब के साथ काम कर जाना कि एक पत्रकार का सबसे पहला दायित्व है, हर विचारधारा का सम्मान और उसको छपने देना. क्योंकि वादे-वादे जायते तत्त्वबोधा: अर्थात् परस्पर बातचीत और वाद विवाद से ही सत्य उभरता है. राय साहब के बयान पर वितंडा खड़ा करना सत्य से आंखें चुराना है. आज गांधी जयंती पर हमें हर व्यक्ति के लोकतांत्रिक विचारों का सम्मान करना चाहिए. यही असली गांधी मार्ग है.





