भारत में कानून कैसे बनता है? जानिए बिल से कानून बनने तक की पूरी प्रक्रिया

किसी शाम टीवी खोलिए और शायद यह एक मिनट में हो जाए. किसी बिल का नाम आता है. सदन में हाथ उठते हैं. स्पीकर कहते हैं, “पारित.” चैनल अगली खबर पर चला जाता है. देखने में यह पल भर का काम लगता है. असल में ऐसा कभी नहीं होता. उस 10 सेकंड की क्लिप से पहले, वही कागज महीनों तक बार-बार पढ़ा गया होता है, उस पर बहस हुई होती है, उसे जांचा गया होता है. यह हिस्सा हम कभी नहीं देखते. हम सिर्फ आखिरी पल देखते हैं. 

तो एक सवाल पूछने लायक है. कानून बनने से पहले किसी बिल को तीन बार पढ़ा ही क्यों जाता है? इस पूरे तरीके में हर पढ़ाई का अपना नाम है. पहली बार पढ़े जाने पर, कोई मंत्री या सांसद सिर्फ इतना करता है कि बिल को सदन में लाने की इजाज़त मांगता है. अभी कोई बहस नहीं होती. बिल छपकर आम लोगों के सामने रख दिया जाता है, ताकि कोई भी चाहे तो उसे पढ़ सके. 

‘संसद में काम हो रहा है’

फिर वह हिस्सा आता है जो ज़्यादातर लोग ‘संसद में काम हो रहा है’ सुनते ही सोचते हैं. दूसरी बार पढ़े जाने पर बिल की हर लाइन पर चर्चा होती है. सांसद किसी एक वाक्य में, किसी एक आंकड़े में, किसी एक शब्द में बदलाव सुझा सकते हैं. इस चरण से पहले बिल को किसी समिति के पास भी भेजा जा सकता है, यानी सांसदों के एक छोटे समूह के पास, जो उसे बारीकी से जांचते हैं, कभी-कभी हफ्तों तक और कई बार बाहर के जानकारों और आम नागरिकों की राय भी लेते हैं.

भारत की संसद में दो सदन

तीसरी बार पढ़े जाने तक ज़्यादातर बहस खत्म हो चुकी होती है. यहां सदन बिल के आखिरी रूप पर वोट डालता है. और यह सफर अभी आधा ही हुआ है. भारत की संसद के दो सदन हैं, लोकसभा और राज्यसभा. धन विधेयक को छोड़कर, जो सिर्फ टैक्स और सरकारी खर्च से जुड़ा होता है और जिसके अपने छोटे नियम हैं, हर आम बिल को दोनों सदनों से, एक के बाद एक, तीनों पढ़ाइयों से गुजरना पड़ता है. उसके बाद ही यह राष्ट्रपति के पास मंज़ूरी के लिए जाता है. तभी जाकर कोई बिल कानूनी रूप से अधिनियम बनता है.

तीन बार पढ़ना. दो सदन. एक हस्ताक्षर. यही तरीका बनाया गया है. यह जानबूझकर धीमा लगता है और है भी. याद कीजिए, आपने आखिरी बार कोई ऐसा फैसला कब लिया था जिसे बाद में बदला नहीं जा सकता था. कोई लोन साइन करना. कोई बड़ा फैसला मान लेना. कोई ऐसा ईमेल भेजना जिसे वापस नहीं लिया जा सकता. ज़्यादातर लोग कोशिश करते हैं कि पहले पढ़ें कि लिखा क्या है, फिर दोबारा पढ़ें कि मतलब क्या है. एक अरब से ज़्यादा लोगों को असर करने वाले कानून को कम से कम इतनी सावधानी तो मिलनी ही चाहिए, शायद उससे भी ज़्यादा.

संसद के कामकाज पर नजर

लेकिन यहीं से कहानी थोड़ी असहज हो जाती है. हर बिल को यह सावधानी नहीं मिलती. पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च, जो सालों से संसद के कामकाज पर नजर रखता आया है, उसके मुताबिक 14वीं और 15वीं लोकसभा में, यानी 2004 से 2014 के बीच, 60 प्रतिशत और 71 प्रतिशत बिल जांच के लिए किसी समिति के पास भेजे गए थे. 16वीं लोकसभा में यह आंकड़ा गिरकर 26 प्रतिशत रह गया. 17वीं लोकसभा के कई सत्रों में तो कई बिल पास हुए, पर एक भी समिति के पास नहीं गया.

यानी जिस संसद को धीमा चलने और अपने ही काम की जांच करने के लिए बनाया गया था, उसने पिछले कुछ सालों में अक्सर इस सबसे धीमे और सबसे सावधान हिस्से को छोड़ना ही चुना है. यह किसी एक पार्टी या किसी एक सरकार की कहानी नहीं है. जो भी पार्टी सत्ता में रही है, उसने कभी न कभी अपने बिल जल्दी पास कराने चाहे हैं. जो भी पार्टी विपक्ष में रही है, उसने कभी न कभी ज़्यादा जांच की मांग की है. जल्दी करने का दबाव सरकार चलाने के काम में ही छिपा है. और जल्दी करने का खतरा भी उसी में छिपा है.

बहस हुए भी पास हुआ कानून

बिना ठीक से बहस हुए भी पास हुआ कानून पूरी तरह हर नागरिक पर लागू हो सकता है. इसे उसी तरह लागू किया जा सकता है, वही पुलिस, वही अदालतें, जैसे साल भर की गहरी बहस के बाद बने कानून को किया जाता है. कागज को याद नहीं रहता कि उस पर कितनी मेहनत हुई थी. यह सिर्फ उन लोगों को याद रहता है, जिन्हें उसके साथ जीना पड़ता है.

यह इसलिए मायने रखता है क्योंकि कोई कानून सिर्फ उस दिन पूरा नहीं होता जिस दिन वह पास होता है. वह उस दिन पूरा होता है, जिस दिन किसी को, कहीं, उसके साथ जीना पड़ता है. कोई अस्पष्ट शब्द, कोई अनदेखा असर, कोई ऐसी लाइन जिस पर समिति में किसी ने सवाल नहीं उठाया, ये स्पीकर के हथौड़े की आवाज़ के साथ गायब नहीं हो जातीं. ये बाद में सामने आती हैं, किसी अदालत में, किसी थाने में, किसी के आम हफ्ते में.

जल्दी पास हुआ हर कानून बुरा?

इसका यह मतलब नहीं कि जल्दी पास हुआ हर कानून बुरा होता है, या हर लंबी बहस वाला कानून अच्छा. रफ्तार दुश्मन नहीं है. लापरवाही है. अगली बार जब आप किसी बिल को 10 सेकेंड की क्लिप में पास होते देखें, तो एक छोटा सा सवाल पूछने लायक है. क्या इसे उतनी ही सावधानी से पढ़ा गया, जितनी इसे मिलनी चाहिए थी, या सिर्फ उतनी, जितनी काम पूरा करने के लिए जरूरी थी?

स्रोत: पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च, “इन अ रश टू पास बिल्स, 17वीं लोकसभा इज़ नॉट स्क्रूटिनाइज़िंग फ्यूचर लॉज़ एनफ”; पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च, “हाउ इज़ अ लॉ इनेक्टेड इन पार्लियामेंट”; लॉभूमि, “हाउ डज़ अ बिल बिकम अ लॉ इन इंडिया”; भारत का संविधान, अनुच्छेद 107111.