
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की. कोर्ट ने न्यायिक नियुक्तियों में भी ऐसी ही तत्परता की कामना की. याचिकाकर्ताओं ने विपक्ष से परामर्श के बिना जल्दबाजी में नियुक्तियों पर सवाल उठाए, हालांकि कोर्ट ने केंद्र के इरादे पर तुरंत सहमति नहीं जताई. मामले की अगली सुनवाई 14 मई को होगी.
याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया ने कहा कि विपक्ष के नेता से प्रभावी परामर्श किए बिना ही चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति जल्दबाजी में की गई. 2024 में नए कानून के अनुसार चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर रोक लगाने के लिए एक अर्जी दायर की गई थी.
हंसारिया ने दावा किया कि अदालत में अर्जी की सुनवाई से पहले ही केंद्र सरकार ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए जल्दबाजी में कदम उठाए.
हंसारिया ने कहा कि 13 मार्च 2024 को विपक्ष के नेता को 200 चयनित नामों की सूची दी गई थी. अगले दिन चयन समिति की बैठक हुई और ज्ञानेश कुमार और सुखबीर संधू के नाम चुने गए. हंसारिया ने आगे कहा कि जब आप एक व्यक्ति को पूर्ण शक्ति दे देते हैं तो यही होता है. विपक्ष के नेता से एक दिन में इतने सारे नामों की जांच करने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?
इस पर जस्टिस दीपांकर दत्ता ने टिप्पणी की और कहा कि हम केवल यही कह सकते हैं कि हम जजों की नियुक्ति में विशेष रूप से HC के जजों की नियुक्ति में ऐसी ही तत्परता की कामना करते हैं.
14 मई को मामले की अगली सुनवाई
हालांकि, बेंच इस बात से सहमत नहीं थी कि केंद्र ने स्टे एप्लीकेशन की सुनवाई को पटरी से उतारने के लिए जल्दबाजी में नियुक्तियां कीं. सुनवाई के दौरान जस्टिस दत्ता ने पूछा कि क्या आप हमें यह दिखाए बिना कोई मकसद बता सकते हैं कि केंद्र को 15 तारीख के बारे में जानकारी थी? जब आप चाहते हैं कि हम यह घोषित करें कि किसी मकसद से कुछ एक्टिवेट किया गया था, तो आपको हमें यह भी सैटिस्फाई करना होगा कि यूनियन को भी पता था कि 15 तारीख ही तारीख है और इसलिए, इसे (सिलेक्शन) 14 तारीख को आगे बढ़ाया गया





