ग्राम प्रधान से ग्रामसभा तक: आपके गांव का शासन आखिर कैसे चलता है?

भारत के ज्यादातर गांवों में गांव की जिम्मेदारी संभालने वाले व्यक्ति को प्रधान कहा जाता है. प्रधान को गांव के लोग चुनते हैं. वह गांव की पंचायत का प्रमुख होता है. गांव के लिए प्रधान वही जगह रखता है, जो शहर के लिए मेयर रखता है. प्रधान के नीचे, ज्यादातर राज्यों में, पंचायत सचिव होता है। वह आम तौर पर सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारी होता है, जो कागजों का काम, रिकॉर्ड और रोज़मर्रा का प्रशासन संभालता है. यानी शहरों में हमने मेयर और नगर निगम आयुक्त के बीच जो फर्क देखा था, उसका एक छोटा रूप गांव में भी दिखाई देता है. 

आगे बढ़ने से पहले एक आंकड़ा जानना जरूरी है. पूरे भारत में 15 लाख से ज्यादा चुने हुए गांव के प्रतिनिधि महिलाएं हैं. बिहार जैसे कुछ राज्यों में पंचायत की आधे से ज्यादा सीटों पर महिलाएं चुनी गई हैं. दुनिया में कहीं भी स्थानीय सरकार में एक साथ, इतनी बड़ी संख्या में और इतने बड़े स्तर पर महिलाएं चुनी हुई प्रतिनिधि नहीं हैं. 

संविधान में एक बड़ा बदलाव

ऐसा अपने आप नहीं हुआ. साल 1992 में संविधान में एक बड़ा बदलाव किया गया. इसे 73वां संविधान संशोधन कहा जाता है. इसने गांवों के लिए दो बड़े वादे किए. पहला, हर गांव को अपनी चुनी हुई सरकार मिलेगी, जिसे पंचायत कहा जाएगा, और जिसका चुनाव हर पांच साल में होगा. दूसरा, देश की हर पंचायत में कम से कम एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए होंगी. बाद में कई राज्यों ने इस हिस्से को बढ़ाकर आधा कर दिया.

ग्राम सभा नाम की एक व्यवस्था

73वें संविधान संशोधन ने ग्राम सभा नाम की एक व्यवस्था भी बनाई. यह कोई छोटी चुनी हुई समिति नहीं है. गांव का हर वह व्यक्ति जो मतदाता के रूप में दर्ज है, ग्राम सभा का सदस्य है. साल में कम से कम दो बार सभी लोग एक साथ बैठकर पंचायत की योजनाओं और कामों पर बात कर सकते हैं और उन्हें मंजूरी दे सकते हैं. सोचिए, लोकतंत्र इससे ज्यादा सीधे रूप में और क्या हो सकता है? केवल पांच साल में एक बार वोट डालना और फिर उम्मीद करना कि सब ठीक होगा, नहीं. गांव के लोग खुद एक जगह बैठें, अपने गांव के पैसे और योजनाओं पर बात करें और तय करें कि गांव में क्या होना चाहिए.

कागज पर यही वादा है. लेकिन जैसा अक्सर होता है, असली जिंदगी थोड़ी अलग और ज्यादा जटिल होती है. उसी 1992 के संविधान संशोधन में पंचायतों के लिए 29 ऐसे काम बताए गए थे, जिनकी जिम्मेदारी उन्हें मिलनी थी. इनमें पीने का पानी, सड़कें, प्राथमिक स्वास्थ्य, खेती में मदद और गांव के स्कूल जैसे काम शामिल थे.

पैसे के लिए राज्य सरकार पर निर्भर

कई दशक बीत जाने के बाद भी ज्यादातर राज्यों ने इन सभी 29 कामों की पूरी जिम्मेदारी पंचायतों को नहीं दी है. पंचायतों को अक्सर उस पैसे के लिए राज्य सरकार पर निर्भर रहना पड़ता है, जिसे राज्य सरकार जब चाहे और जितना चाहे जारी करे. उनके पास हमेशा अपना तय और पक्का बजट नहीं होता. इसलिए प्रधान अपने गांव का कुआं ठीक कराना चाहता हो, फिर भी उसे कई किलोमीटर दूर किसी सरकारी दफ्तर से पैसे आने का इंतजार करना पड़ सकता है.

एक और बात है, जिसे ईमानदारी से समझना जरूरी है. कुछ गांवों में जब कोई महिला आरक्षित सीट से प्रधान चुनी जाती है, तो उसके पति या परिवार का कोई दूसरा पुरुष सदस्य उसके नाम पर असली फैसले लेने लगता है. शोधकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस समस्या को एक नाम दिया है, ‘प्रधान पति. यानी लगभग, प्रधान का पति.

हालांकि ऐसा हर जगह नहीं होता. बहुत सी चुनी हुई महिलाएं अपनी पंचायत खुद, पूरी मजबूती से चलाती हैं. लेकिन यह समस्या इतनी जगह दिखाई देती है कि भारतीय स्थानीय शासन में इसे एक पहचानी हुई समस्या माना जाने लगा है. यह हमें याद दिलाती है कि आरक्षित सीट जीतना और असली ताकत अपने हाथ में होना, हमेशा एक ही बात नहीं होती.

आपका गांव सच में कौन चलाता है?

कागज पर जवाब आसान है. प्रधान, जिसे आप चुनते हैं, और ग्राम सभा, जिसमें आप और गांव का हर दूसरा मतदाता शामिल होता है. लेकिन असल जिंदगी में जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि इस साल राज्य सरकार ने पंचायत को कितना पैसा दिया. यह भी इस बात पर निर्भर करता है कि चुनाव जीतने वाला व्यक्ति ही सच में फैसले ले रहा है या नहीं. और यह भी इस बात पर निर्भर करता है कि ग्राम सभा की बैठक में कितने गांव वाले पहुंचते हैं. क्योंकि अगर बैठक में लोग ही नहीं आएंगे, तो फिर किसी से जवाब मांगने वाला कौन होगा?

इस आखिरी बात पर हर गांव वाला कुछ कर सकता है. ग्राम सभा की बैठक में जाने के लिए आपको किसी से अनुमति लेने की जरूरत नहीं है. आप वहां कोई मेहमान नहीं हैं. जिस दिन आपकी उम्र वोट देने लायक होती है, उसी दिन से आप ग्राम सभा के सदस्य हैं. यह आपका अधिकार है.

ज्यादातर ग्राम सभाओं की बैठकें आधी भी नहीं भरतीं. इसका मतलब यह है कि बहुत से गांव चुपचाप अपने गांव को चलाने की जिम्मेदारी उन्हीं लोगों के हाथ में दे रहे हैं, जो उस बैठक में पहुंचते हैं. तो क्या आपके गांव में हाल ही में ग्राम सभा की बैठक हुई है? और अगर हुई है, तो क्या आप उस कमरे में मौजूद थे?