ग़ज़ल : मुर्दे कहीं बताते हैं ज़ख़्मी बदन का हाल

क़ब्रों पे किस से पूंछते क़ल्बो ज़ेहन का हाल,
मुर्दे कहीं बताते हैं ज़ख़्मी बदन का हाल।
तूफ़ान ने बिखेरे परिंदों के बालों पर,
ज़ाहिर है उन के हाल से उजड़े चमन का हाल।

अपनी ज़मीं को आग की दहशत में झोंक कर,
तू ख़्वाब में दिखाता ख़ला और गगन का हाल।
हर चश्मे मुज़तरिब में है कीचड़ भरा हुआ,
और उस पे पूंछते हो ज़मीनों ज़मन का हाल।

लाशें बिछा के ख़ून की नहरें निकाल कर,
उंगली डुबा के लिखता है ज़ालिम अमन का हाल।
हर इक गली में मौत का बाज़ार है सजा,
हम से न पूँछिये कभी प्यारे वतन का हाल।

‘ मेहदी ‘ हर एक बज़्म में नग़मा सुनाए गा,
जिस से जहाँ में महके गा गंगो जमन का हाल।
मेहदी अब्बास रिज़वी
” मेहदी हल्लौरी “

RIZVI SIR




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